21 मई 2026 करेंट अफेयर्स

यह 21 मई 2026 का करेंट अफेयर्स है। सरकारी नौकरी के लिए होने वाली प्रतियोगिता परीक्षा की बेहतर तैयारी के लिए डेली करेंट अफेयर्स के सवाल-जवाब यहां बता रहे हैं।

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1. अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2026 के विजेता का नाम बताएं?
Name the winner of the 2026 International Booker Prize.

a. यांग शुआंग-ज़ी
b. लिन किंग
c. डेजी रॉकवेल
d. राहिणी आहूजा

a. यांग शुआंग-ज़ी

– यांग शुआंग-ज़ी 42 वर्ष की ताइवानी लेखिका हैं।
– 19 मई 2026 को लंदन में इंटरनेशनल बुकर अवॉर्ड की घोषणा हुई।
– यांग शुआंग-ज़ी पहली ताइवानी लेखिका हैं, जिन्‍हें बुकर प्राइज मिला।
– उन्‍हें उनकी बुक ‘ताइवान ट्रैवलॉग’ के लिए अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार के लिए चुना गया।
– यह मंदारिन चीनी भाषा में है।
– इसका अंग्रेजी ट्रांसलेशन लिन किंग ने किया है।

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2. लेखिका यांग शुआंग-ज़ी को किस उपन्यास के लिए अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार 2026 प्राप्त हुआ?
For which novel did author Yang Shuang-zi receive the 2026 International Booker Prize?

a. सिडार्थ
b. ताइवान ट्रैवलॉग
c. कैरोस
d. द कैंटरबरी

Answer: b. ताइवान ट्रैवलॉग

– ताइवान की लेखिका यांग शुआंग-ज़ी को उनकी बुक ‘ताइवान ट्रैवलॉग’ के लिए अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार के लिए चुना गया।
– इसमें यांग शुआंग-ज़ी की ताइवान यात्रा वृत्तांत है।
– यह मूल रूप से मंदारिन चीनी भाषा में लिखा गया है।

अनुवादक
– जिसका अंग्रेजी अनुवाद 32 वर्षीय लिन किंग द्वारा किया गया है।
– 2024 में अनुवादित साहित्य के लिए इस अंग्रेजी अनुवाद को ‘अमेरिकन नेशनल बुक अवार्ड’ (राष्ट्रीय पुस्तक पुरस्कार) से भी सम्मानित किया गया है।
– बुकर पुरस्कार में 50,000 पाउंड (64,000 अमेरिकी डॉलर) की राशि दी जाती है, जो लेखक और ट्रांसलेटर के बीच में आधी आधी बांटी जाती है।

ताइवान की पृष्ठभूमि पर आधारित प्रेम कहानी है
– यह पुस्तक 1930 के दशक के दौरान जापान के व्यवसाय वाले ताइवान की पृष्ठभूमि पर आधारित एक प्रेम कहानी और यात्रा वृत्तांत है।
– यह मई कहानी 1938 में शुरू होती है, जब आयोयामा चिज़ुको नाम की एक जापानी लेखिका ताइवान की यात्रा पर गयी थी।
– साम्राज्यवादी चमत्कार से दूर, चिज़ुको ताइवान के वास्तविक जीवन और वहाँ के प्रामाणिक इतिहास (जैसे स्थानीय भोजन) का अनुभव करना चाहते हैं।
– इस यात्रा में ताइवान की एक महिला चिज़ुको अपनी सहेली से बेहद लगाव महसूस करने लगती है और यहाँ तक कि उससे सगाई तोड़ने का आग्रह भी करती है, लेकिन चिज़ुरु दूरी बनाए रखती है।
– क्या वह चिज़ुको की भावनाओं का जवाब देगी, यही सवाल उपन्यास को आगे बढ़ाता है।
– साम्राज्य और उपनिवेश से आई एक महिला की अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि से प्रभावित उनका रिश्ता सत्ता की जटिल गतिशीलता को दर्शाता है।

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3. तीसरा भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन 2026 किस देश में आयोजित हुआ?
In which country was the 3rd India-Nordic Summit held in 2026?

a. डेनमार्क
b. नॉर्वे
c. स्वीडन
d. आइसलैंड

Answer: b. नॉर्वे

– यह शिखर सम्‍मेलन 19 मई 2026 को नॉर्वे की राजधानी ओस्‍लो में आयोजित हुआ।
– 43 वर्षों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली नॉर्वे यात्रा थी। इससे पहले 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नॉर्वे का दौरा किया था।

नॉर्डिक देशों की लिस्‍ट
– डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, आइसलैंड,

तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में शामिल देश व नेता
– आइसलैंड की PM क्रिस्ट्रुन फ्रॉस्टडॉटिर
– स्वीडन के PM उल्फ क्रिस्टर्सन
– नॉर्वे के PM जोनास गहर स्टोरे
– डेनमार्क की कार्यवाहक PM मेटे फ्रेडरिक्सन
– फिनलैंड के PM पेटेरी ओर्पो
– भारत के PM नरेंद्र मोदी

अब तक के भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन की लिस्‍ट
– पहला (2018): स्टॉकहोम, स्वीडन
– दूसरा (2022): कोपेनहेगन, डेनमार्क
– तीसरा (19 मई 2026): ओस्लो, नॉर्वे
– अगला (चौथा) शिखर सम्मेलन (प्रस्तावित): हेलसिंकी, फिनलैंड में होगा।

महत्‍वपूर्ण फैसला
– नॉर्डिक देशों और भारत के संबंधों को “हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी” (Green Technology and Innovation Strategic Partnership) के स्तर पर ले जाने का निर्णय लिया गया।

शिखर सम्मेलन के प्रमुख स्तंभ और रणनीतिक निर्णय
– दोनों पक्षों ने सतत विकास, नवाचार और पर्यावरण-अनुकूल विकास के प्रति अपनी साझा प्रतिबद्धता को रेखांकित करते हुए द्विपक्षीय संबंधों को एक नए रणनीतिक ढांचे में बदला।
– नॉर्डिक निवेश: भारत ने ग्रीन ट्रांजिशन, ब्लू इकोनॉमी (समुद्री अर्थव्यवस्था), ग्रीन शिपिंग (पर्यावरण-अनुकूल जहाज निर्माण), रिन्‍युएबल एनर्जी और जल प्रबंधन में नॉर्डिक निवेश का आह्वान किया।
– वैश्विक पहलें: नॉर्डिक देशों ने भारत के मिशन LiFE (Lifestyle for Environment) और लीडरशिप ग्रुप फॉर इंडस्ट्री ट्रांजिशन (LeadIT 3.0) जैसी फ्लैगशिप पहलों का समर्थन किया। विकासशील देशों के लिए किफायती जलवायु वित्त (Climate Finance) और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर भी सहमति बनी।
– वैज्ञानिक सहयोग: आर्कटिक काउंसिल में एक ‘पर्यवेक्षक’ (Observer) के रूप में भारत की सकारात्मक भूमिका की सराहना की गई। दोनों पक्षों ने सतत आर्कटिक अर्थव्यवस्था, समुद्री सहयोग और स्वदेशी ज्ञान विनिमय (Indigenous Knowledge Exchange) पर ध्यान केंद्रित करते हुए संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं की संभावनाओं को तलाशने पर सहमति व्यक्त की।

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Q. ‘नॉर्डिक देशों’ (Nordic Countries) के समूह में निम्नलिखित में से कौन-से देश शामिल हैं?

1) डेनमार्क
2) फिनलैंड
3) नॉर्वे
4) स्वीडन
5) आइसलैंड

नीचे दिए गए कूट का उपयोग करके सही उत्तर चुनिए:
a. केवल 1, 3 और 4
b. केवल 1, 2, 3 और 4
c. केवल 2, 4 और 5
d. 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर: d. 1, 2, 3, 4 और 5 (सभी पांचों देश नॉर्डिक समूह का हिस्सा हैं)।

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4. तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन 2026 के दौरान दोनों पक्षों ने साझेदारी को किस स्‍तर तक ले जाने का फैसला किया?
To what level did both sides decide to elevate their partnership during the 3rd India-Nordic Summit in 2026?

a. वैश्विक डिजिटल और साइबर सुरक्षा रणनीतिक साझेदारी
b. व्यापक आर्थिक सहयोग और मुक्त व्यापार रोडमैप
c. सतत महासागर और समुद्री अर्थव्यवस्था साझेदारी
d. हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी

Answer: d. हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी

– नॉर्डिक देशों और भारत के संबंधों को “हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी” (Green Technology and Innovation Strategic Partnership) के स्तर पर ले जाने का निर्णय लिया गया।

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5. विश्व माप विज्ञान दिवस कब मनाया जाता है?
When is World Metrology Day celebrated?

a. 17 May
b. 18 May
c. 19 May
d. 20 May

Answer: d. 20 May

2026 की थीम
– मेट्रोलॉजी: नीति-निर्माण में विश्वास का निर्माण
– Metrology: Building Trust in Policy Making

मेट्रोलॉजी क्या है?
– मापिकी (Metrology) भौतिकी की वह शाखा है जिसमें शुद्ध माप के बारे में हमें ज्ञान होता है।

क्‍यों आयोजित होता है दिवस :
– पेरिस में 20 मई 1875 में मीटर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर हुआ था।
– यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि थी, जिसने माप की इकाइयों को पूरी दुनिया में एकरूपता लाने का काम किया।
– इस दिवस को यूनेस्‍को का समर्थन है।

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6. PM मोदी की ‘गोटेबर्ग’ यात्रा के दौरान ‘भारत-स्वीडन संयुक्त कार्य योजना 2026-2030’ पर सहमति बनी, इसके तहत 5 वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार कितना बढ़ाने का लक्ष्‍य है?
During PM Modi’s visit to Gothenburg, the ‘India-Sweden Joint Action Plan 2026-2030’ was agreed upon; under this plan, what is the target for increasing bilateral trade over the next five years?

a. डेढ़ गुना
b. दो गुना
c. ढ़ाई गुना
d. तीन गुना

Answer: b. दो गुना ($7.75 बिलियन से दोगुना करके $15.5 बिलियन करना)

– स्वीडन के गोटेबर्ग में यह ऐतिहासिक समझौता भारत PM नरेंद्र मोदी और स्वीडन के PM उल्फ क्रिस्टरसन की मौजूदगी 17 मई 2026 को हुआ।
– भारत और स्वीडन ने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की।
– इस दौरान यूरोपीय संघ (EU) की प्रेसिडेंट उर्सुला वॉन डेर लेयन भी मौजूद थी।

भारत-स्वीडन संयुक्त कार्य योजना 2026-2030
– मुख्य उद्देश्य: अगले 5 वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करना और ‘नेक्स्ट-जेनरेशन’ तकनीकों में रणनीतिक सहयोग बढ़ाना।
– वर्तमान स्थिति (Base Year – 2025): दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग $7.75 बिलियन (7.75 अरब डॉलर) रहा।
दोगुना करने का मतलब (Target): अगले 5 वर्षों में इसे बढ़ाकर $15.5 बिलियन (15.5 अरब डॉलर) तक पहुंचाना है।

1) सुरक्षा और रक्षा (Security & Defence)
– रणनीतिक संवाद: भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) और स्वीडन के NSA कार्यालय के बीच सीधा संपर्क।
– रक्षा निवेश: भारत के डिफेंस कॉरिडोर में स्वीडन द्वारा रक्षा उत्पादन और नवाचार निवेश को बढ़ावा देना।
– साइबर सुरक्षा: नियमित साइबर नीति संवाद और टेरर फंडिंग के खिलाफ संयुक्त लड़ाई।

2) आर्थिक और व्यापार (Economy & Trade)
– नया नारा: “Make in India” और “Made with Sweden” पहलों को मिलाकर सह-उत्पादन बढ़ाना।
– शिखर सम्मेलन 2027: भारत में व्यापार सम्मेलन होगा जिसका विषय “Stronger Together – towards 2047” है।
– कनेक्टिविटी: दोनों देशों के बीच सीधी हवाई सेवा फिर से शुरू होगी।

3) उभरती प्रौद्योगिकियां (Emerging Tech)
– ISJSTC केंद्र: वर्चुअल ‘भारत-स्वीडन संयुक्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी केंद्र’ की स्थापना, जो 6G, क्वांटम कंप्यूटिंग और अंतरिक्ष पर काम करेगा।
– SITAC कॉरिडोर: ‘इंडिया एआई मिशन’ और ‘बिजनेस स्वीडन’ के बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस साझेदारी के लिए “स्वीडन-भारत एआई कॉरिडोर” लॉन्च।

4) पर्यावरण और संस्कृति (Planet & People)
– ग्रीन स्टील (LeadIT): ‘लीडरशिप ग्रुप फॉर इंडस्ट्री ट्रांजिशन’ के तहत स्टील और सीमेंट उद्योगों को प्रदूषण मुक्त (Green) बनाने पर सहयोग।
– क्रिटिकल मिनरल्स: कम-ग्रेड और जटिल खनिज भंडारों से सुरक्षित निष्कर्षण (Extraction) के लिए स्वीडिश खनन तकनीक का उपयोग।
– टैगोर-स्वीडन लेक्चर सीरीज: रवींद्रनाथ टैगोर की स्वीडन यात्रा के 100 वर्ष पूरे होने पर 2026 में सांस्कृतिक आदान-प्रदान की शुरुआत।

नोट :
– SITAC: भारत और स्वीडन के बीच का एआई (AI) कॉरिडोर है।
– LeadIT: भारत और स्वीडन की संयुक्त वैश्विक पहल है, जो भारी उद्योगों (स्टील/सीमेंट) में कार्बन कम करने से संबंधित है।

स्‍वीडन
– राजधानी: स्टॉकहोम
– मुद्रा: स्वीडिश क्रोना
– पड़ोसी देश: पश्चिम और उत्तर में नॉर्वे, पूर्व में फिनलैंड और दक्षिण में समुद्र के पार डेनमार्क
– जनसंख्या: लगभग 10.7 मिलियन (1.07 करोड़)
– शासन प्रणाली: संवैधानिक राजशाही और संसदीय लोकतंत्र
– राजा: किंग कार्ल XVI गुस्ताफ
– PM: उल्फ क्रिस्टरसन
– नाटो की सदस्यता: 7 मार्च 2024 को नाटो का 32वां सदस्य

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7. झरिया कोयला क्षेत्र, जो अपनी दशकों पुरानी भूमिगत आग के लिए और इससे निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों की वजह से चर्चा में है, यह भारत के किस राज्य में स्थित है?
In which Indian state is the Jharia coalfield located—an area that has been in the news due to its decades-old underground fires and the greenhouse gases emitted by them?

a. छत्‍तीसगढ़
b. पश्चिम बंगाल
c. झारखंड
d. आडिशा

Answer: c. झारखंड (झारिया कोयले क्षेत्र झारखंड के धनबाद जिले में स्थित है और यह भारत के सबसे बड़े कोयले भंडारों में से एक है)

– झारखंड के झरिया कोयला क्षेत्रों के नीचे दशकों से सुलग रही आग को लेकर एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है।
– मई 2026 में एक नए अध्ययन के अनुसार, यह आग हमारी पुरानी अनुमानों से कहीं अधिक गर्म हो सकती है और इससे निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा भी पहले के आंकड़ों से काफी ज्यादा है।
– यूके (U.K.) और भारत के वैज्ञानिकों, जिनमें CSIR-केन्द्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान (CIMFR) भी शामिल है, के एक संयुक्त शोध में यह बात सामने आई है।
– कंप्यूटर मॉडलिंग और सिमुलेशन के आधार पर वैज्ञानिकों का अनुमान है कि कुछ अलग-थलग पड़े बड़े गड्ढों के अंदर का तापमान 4,000°C तक पहुंच सकता है। यह तापमान कोयले की आग के लिए लगाए जाने वाले सामान्य अनुमानों से कहीं ज्यादा है।
– इसे प्रतिष्ठित जर्नल “कम्‍युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरमेंट” में प्रकाशित किया गया है।

जमीन के नीचे 100 मीटर गहरी ‘चिमनियां’
– शोधकर्ताओं के अनुसार, जब भूमिगत आग कोयले की परतों (coal seams) को जलाकर राख कर देती है, तो उसके ऊपर की चट्टानें ढह जाती हैं। इस वजह से जमीन के अंदर बड़े-बड़े गड्ढे और दरारें बन जाती हैं।
– ये ढही हुई संरचनाएं (collapse structures) जमीन के अंदर 100 मीटर से अधिक गहराई तक वर्टिकल (खड़ी) फैल सकती हैं।
– ये संरचनाएं एक तरह की प्राकृतिक चिमनी का काम करती हैं, जो अंदर की बेहद गर्म गैसों को सीधे वायुमंडल में छोड़ रही हैं।
– अध्ययन में झरिया के एना (Ena), बस्ताकोला (Bastacolla), और तीसरा (Tisera) कोलियरी पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया गया था।

आग इतनी तेज कि पिघल गईं चट्टानें; मिला ‘बिरयानीआइट’
– साल 2018 से 2023 के बीच किए गए इस रिसर्च में वैज्ञानिकों को 10 मीटर तक चौड़े गड्ढे मिले। वहां से पत्थरों के पिघलने और फिर से ठोस होने से बने मलबे (paralava) के नमूने मिले हैं।
– खास खोज: एना और तीसरा कोलियरी में वैज्ञानिकों को एक खास किस्म का कांच जैसा चमकीला पत्थर मिला। इस भूगर्भीय सामग्री के अनोखे मिश्रण और दिखने में लोकप्रिय राइस डिश जैसा होने के कारण वैज्ञानिकों ने इसे मजाकिया अंदाज में “बिरयानीआइट” (birianiite) नाम दिया है।

पर्यावरणीय और जलवायु प्रभाव
– विशाल कार्बन पदचिह्न (Carbon Footprint): शोध के अनुसार, झरिया की आग की ग्लोबल वार्मिंग क्षमता (GWP) 748.72 मीट्रिक टन $CO_2$-इक्विवेलेंट प्रति वर्ष तक हो सकती है। तुलनात्मक रूप से, यह मात्रा वर्ष 2023 में पूरे यूनाइटेड किंगडम (UK) के कुल क्षेत्रीय उत्सर्जन से लगभग दोगुनी है।
– उत्सर्जन (Fugitive Emissions): औद्योगिक उत्सर्जन के विपरीत, अनियंत्रित कोयला खदानों से होने वाले इस रिसाव को वैश्विक या राष्ट्रीय ग्रीनहाउस गैस ऑडिट/इन्वेंट्री में शायद ही कभी शामिल किया जाता है, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि (Global Warming) के आंकड़ों में एक बड़ा ‘डेटा गैप’ (Data Gap) पैदा होता है।

कोयला खदानों में आग लगने के कारण
– स्वतःस्फूर्त दहन (Spontaneous Combustion): जब ओपनकास्ट माइनिंग या अवैध खनन के कारण कोयला हवा (ऑक्सीजन) के संपर्क में आता है, तो प्राकृतिक ऑक्सीकरण (Natural Oxidation) की प्रक्रिया शुरू होती है। इससे ऊष्मा उत्पन्न होती है और यदि ऊष्मा बाहर नहीं निकल पाती, तो कोयला स्वतः सुलगने लगता है।
– अवैज्ञानिक खनन पद्धतियां: अतीत में अपनाई गई असुरक्षित और अनियोजित खनन प्रणालियों के कारण खदानों के मुहाने खुले रह गए, जिससे आग को निरंतर ऑक्सीजन मिलती रही।

चुनौतियाँ और समाधान
– चुनौतियाँ: आग का असमान और अनियमित प्रसार होने के कारण इसे सटीक रूप से ट्रैक करना कठिन है। इसके अलावा, स्थानीय आबादी का विस्थापन और पुनर्वास (जैसे झरिया पुनर्वास योजना) एक बड़ी सामाजिक-आर्थिक चुनौती है।
– तकनीकी हस्तक्षेप: आग को बुझाने के लिए नाइट्रोजन फोम इंजेक्शन (Nitrogen Foam Injection), रेत-कीचड़ की भराई (Slurry Flushing) और सतह को पूरी तरह से सील करने जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग।
– नीतिगत सुधार: राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर ‘फ्यूजिटिव उत्सर्जन’ को भी ‘नेट-ज़ीरो’ (Net-Zero 2070) कार्बन उत्सर्जन रणनीतियों और पर्यावरण ऑडिट में शामिल किया जाना चाहिए।

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8. आतंकवाद विरोधी दिवस कब मनाया जाता है?
When is Anti-terrorism day observed?

a. 21 May
b. 22 May
c. 23 May
d. 24 May

Answer: a. 21 May

– पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्य तिथि पर आतंकवाद निरोधी दिवस घोषित है।
– जिनकी 21 मई, 1991 को मद्रास (अब चेन्नई) के पास एक गाँव श्रीपेरंबदूर में हत्या कर दी गई थी।
– आतंकवाद विरोधी दिवस मनाने के पीछे का उद्देश्य लोगों को आतंकवाद और हिंसा से दूर रखना है।

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9. भाजपा नेता बीसी खंडूरी का निधन 19 मई 2026 हो गया, वह किस राज्‍य के पूर्व मुख्‍यमंत्री थे?
BJP leader B.C. Khanduri passed away on May 19, 2026. He was the former Chief Minister of which state?

a. हिमाचल प्रदेश
b. उत्तराखंड
c. उत्‍तर प्रदेश
d. बिहार

Answer: b. उत्तराखंड

– 91 वर्षीय बी.सी. खंडूरी का वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों के कारण निधन हो गया।
– भुवन चंद्र खंडूरी भारतीय सेना में मेजर जनरल रहे।
– वे 1954 से 1990-91 तक भारतीय सेना में रहे।
– 1991 में सेना से रिटायरमेंट के बाद भाजपा ज्‍वाइन की।
– गढवाल से पहली बार सांसद बने।
– उन्होंने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में दो बार कार्यभार संभाला।
– पहला कार्यकाल 2007 से 2009 तक।
– दूसरा कार्यकाल 2011 से 2012 तक।
– वे उत्तराखंड के चौथे मुख्‍यमंत्री थे।
– उत्तराखंड में 2007 से धूमा विधानसभा से सीट खाली हुई थी तब वहां बिना चुनाव लड़े ही सीएम बने।
– उनका जन्‍म वर्ष 1934 में देहरादून में हुआ था।
– 1990 में राजनीति से जुड़े।
– अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार में केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री थे।
– वे स्वर्ण चतुर्भुज परियोजना सहित भारत के प्रमुख राजमार्ग विस्तार प्रयासों से जुड़े रहे।
– उनकी बेटी ऋतु खंडूरी भूषण भाजपा की वरिष्ठ नेता हैं और वर्तमान में उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष हैं।
– बी.सी. खंडूरी के निधन पर प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति समेत राजनीतिक हस्तियों ने शोक जताया।

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10. भारतीय मूल के तुषार कुमार किस देश के सबसे युवा मेयर चुने गए?
Tushar Kumar, of Indian origin, was elected as the youngest mayor of which country?

a. स्विटजरलैंड
b. फ्रांस
c. आयरलैंड
d. ब्रिटेन

Answer: d. ब्रिटेन

– 23 वर्षीय तुषार कुमार नाम के इस युवा नेता को ब्रिटेन के एल्स्ट्री और बोरहमवुड शहर का मेयर बनाया गया है।


– ये ब्रिटेन के इतिहास में सबसे कम उम्र के इंडियन-ओरिजिन मेयर बने।
– यानी भारतीय मूल का कोई भी शख्स इससे पहले इतनी कम उम्र में कभी मेयर नहीं बना।
– तुषार कुमार ने लंदन की मशहूर किंग्स कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में पढ़ाई की है।
– वो ब्रिटेन की एक बड़ी राजनीतिक लेबर पार्टी से जुड़े हैं।
– 2023 में वो एल्स्ट्री और बोरहमवुड टाउन काउंसिल के सदस्य यानी काउंसलर बने।
– ये एक लोकल काउंसिल है जो पूर्वी इंग्लैंड में आती है।
– उस वक्त भी वो काफी युवा काउंसलर में से एक थे।
– काउंसिल में आने के बाद उन्होंने पहले डिप्टी मेयर की जिम्मेदारी संभाली।
– मई 2026 में मेयर बने।

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11. अंतर्राष्‍ट्रीय चाय दिवस कब मनाया जाता है?
When is International Tea Day celebrated?

a. 21 May
b. 23 May
c. 24 May
d. 25 May

Answer: a. 21 May

2026 की थीम
– चाय को बनाए रखना, समुदायों को सहारा देना
– Sustaining Tea, Supporting Communities

– अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस का पहला उत्सव 2005 में भारत, श्रीलंका, नेपाल और केन्या जैसे प्रमुख चाय उत्पादक देशों में मनाया गया था, जिसका उद्देश्य चाय उत्पादकों की स्थिति और बदलते चाय बाजार पर ध्यान केंद्रित करना था।
– इस मुद्दे पर संज्ञान लेते हुए, 2019 में, संयुक्त राष्ट्र ने आधिकारिक तौर पर 21 मई को अंतर्राष्ट्रीय चाय दिवस के रूप में घोषित किया।

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12. विषय: डॉलर की उड़ान, हांफता रुपया और भारतीय अर्थव्यवस्था का पूरा अर्थशास्त्र

डॉलर की रफ्तार और रुपए की बेबसी

– आज भारतीय आर्थिक जगत और वैश्विक बाजार से एक ऐसी खबर आ रही है जिसने हर आम और खास इंसान की चिंता बढ़ा दी है। कहते हैं कि ‘डॉलर भाग रहा है और रुपया हांफ रहा है, और हमारी जेब चुपचाप ये सब देख रही है।’

– इस समय पूरे देश में और आर्थिक गलियारों में हंगामा इस बात पर बरपा है कि डॉलर जिस तेज रफ्तार से आगे भाग रहा है, कहीं वह आने वाले दिनों में 100 के आंकड़े को पार न कर जाए। अब यहाँ पर एक यक्ष प्रश्न खड़ा होता है, एक ऐसा सवाल जो सीधे आपकी और हमारी जिंदगी से जुड़ा है—कि अगर रुपए का गिरना इसी तरह जारी रहा और यह बंद नहीं हुआ, तो देश का क्या होगा? हमारी अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा?

मुख्य बिंदु:
– तेल की वैश्विक खरीद डॉलर में ही होती है। जब डॉलर महंगा होगा, तो तेल के दाम अपने आप आसमान छूने लगेंगे। ये दोनों कारक मिलकर देश की जनता और सरकार के बैंक बैलेंस का संतुलन बिगाड़ने में लगे हैं।

– आप सब जानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल (Crude Oil) पहले से ही बहुत महंगा चल रहा है। और भारत अपनी जरूरतों का सबसे बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है, जिसका भुगतान हमें डॉलर में ही करना पड़ता है। जब डॉलर महंगा होगा तो तेल और महंगा हो जाएगा। लेकिन यहाँ सबसे महीन और गहरा सवाल यह है कि क्या सिर्फ तेल के महंगे होने से ही डॉलर चढ़ रहा है? क्या रुपए के इस कदर कमजोर होने की वजह सिर्फ ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव या युद्ध है, या इस पूरी आर्थिक कहानी में कोई और छुपा हुआ कैमियो या विलेन भी है?

– अगर हम पिछले डेढ़ साल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग ₹10 महंगा हो चुका है। आर्थिक जानकार और विशेषज्ञ तो लंबे समय से यह तक कहते आ रहे थे कि सरकार या रिजर्व बैंक जानबूझकर रुपए का मूल्य गिरा रहे हैं ताकि निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके। लेकिन अब हालात नियंत्रण से बाहर दिख रहे हैं। अब स्थिति यह है कि डॉलर रोके नहीं रुक रहा है।

– भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार अपने खजाने से डॉलर बाजार में निकाल रहा है, ताकि रुपए को संभाला जा सके और बाजार में स्थिरता लाई जा सके, लेकिन फिलहाल इसका नतीजा सिफर यानी शून्य नजर आ रहा है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सरकार ने जरूरी कदम उठाने में बहुत देर कर दी है? आज के इस वीडियो में हम इन सभी जटिल आर्थिक सवालों के जवाब बहुत ही आसान भाषा में तलाशेंगे।

– इस विस्तृत आर्थिक राष्ट्रव्यापी विश्लेषण के साथ-साथ आज हम देश की कुछ अन्य महत्वपूर्ण सुर्खियों पर भी नजर डालेंगे। केरल में वी डी सतीश ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है, हम उनके इस शपथ ग्रहण समारोह की राजनीतिक अहमियत पर बात करेंगे। साथ ही, उत्तर प्रदेश में नमाज को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने क्या बड़ा बयान दिया है, उस पर भी चर्चा करेंगे। और अंत में, भोपाल में हुई ट्विशा की रहस्यमयी मौत का असली सच क्या है, इसे भी जानने की कोशिश करेंगे। तो बने रहिए हमारे साथ इस पूरे वीडियो में।

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रुपया क्यों गिर रहा है? व्यापार घाटा (Trade Deficit) और तेल का खेल

– अब सीधे मुख्य मुद्दे पर आते हैं और समझते हैं कि रुपए की इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे का असली गणित क्या है। डॉलर अब सीधे ₹100 की ओर आंखें तरेर रहा है। पर यहाँ सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि रुपया आज क्यों गिर रहा है।

– असली और बुनियादी सवाल तो यह है कि भारत आज दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (6th Largest Economy) होने का गौरव रखता है, इसके बावजूद हर बड़े वैश्विक संकट में हमारी घरेलू मुद्रा, हमारा रुपया इतनी भारी दबाव में क्यों आ जाता है? क्यों हर इंटरनेशनल क्राइसिस के समय रुपया कमजोर होता चला जाता है?

– अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इसके पीछे कोई एक अकेला कारण नहीं है। बल्कि पूरी वैश्विक आर्थिक व्यवस्था, भारत की विदेशों पर अत्यधिक आयात निर्भरता, अमेरिकी अर्थव्यवस्था की आंतरिक ताकत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की राजनीति जैसे कई बड़े फैक्टर्स हैं, जो एक साथ मिलकर रुपए को कमजोर करते हैं और डॉलर की ताकत को मजबूत करते हैं। आइए इन्हें एक-एक करके बहुत गहराई से समझते हैं।

आयात और निर्यात का असंतुलन (The Concept of Trade Deficit)
– रुपए की कीमत तय होने में सबसे अहम भूमिका निभाता है हमारा आयात और निर्यात यानी इंपोर्ट-एक्सपोर्ट। हम दूसरे देशों के साथ जो व्यापार करते हैं, उसमें जो सामान बाहर से मंगाते हैं उसे आयात कहते हैं और जो सामान अपने देश से विदेशों में बेचते हैं उसे निर्यात कहते हैं। नियम बहुत सीधा है—अगर हमारा निर्यात हमारे आयात से ज्यादा होगा, तो रुपए की वैल्यू बढ़ेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि तब हमारे देश के खजाने से जितने डॉलर बाहर जाएंगे, उससे कहीं ज्यादा डॉलर व्यापार के जरिए हमारे देश के अंदर आएंगे।
– लेकिन भारत के मामले में हमेशा इसका उल्टा होता है। हम विदेशों से खरीदते ज्यादा हैं और उन्हें बेचते बहुत कम हैं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि हम अंतरराष्ट्रीय व्यापार में हमेशा घाटे में रहते हैं। और अर्थशास्त्र की भाषा में इसी घाटे को ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) या व्यापार घाटा कहा जाता है।

अप्रैल 2026 के व्यापारिक आंकड़े


– इस समय वेस्ट एशिया यानी पश्चिम एशिया के संकट (Iran-Israel & Middle East Crisis) ने पूरी दुनिया के व्यापार को बहुत गहरी चोट पहुंचाई है। वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित हो गई है।
– हमारा मर्चेंडाइज इंपोर्ट यानी आयात, निर्यात की तुलना में बहुत ज्यादा रहा है। अप्रैल के महीने में हमने 71.94 अरब डॉलर का सामान बाहर से मंगाया। इसका नतीजा यह हुआ कि केवल एक महीने का भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) लगभग 28 अरब डॉलर दर्ज किया गया।

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खजाने के डॉलर आखिर जा कहाँ रहे हैं?
– अब हमें यह देखना होगा कि हमारे देश के कीमती डॉलर आखिर क्या खरीदने में इतनी तेजी से खर्च हो रहे हैं।
– मीडिया रिपोर्ट्स और ‘द वीक’ की एक विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि अप्रैल 2025 की तुलना में इस बार भारत में सोने का आयात (Gold Import) अविश्वसनीय रूप से 81% बढ़ गया है।
– केवल सोने को खरीदने में हमने करीब 53,200 करोड़ रुपए खर्च कर दिए।
– यही वजह है कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश की जनता से यह अपील करनी पड़ी कि यदि बहुत जरूरी न हो, तो देश हित में कुछ समय के लिए सोना न खरीदें।

– सोने के साथ-साथ चांदी की भी देश में जमकर खरीदारी और आयात किया गया है।
– चांदी का आयात 157% बढ़कर 411 मिलियन डॉलर यानी करीब 3,905 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है।

– अब बात करते हैं सबसे बड़े विलेन यानी कच्चे तेल की।
– हालांकि पिछले साल की तुलना में इस बार petroleum प्रोडक्ट्स का आयात करीब 10% घटा है, क्योंकि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज (Strait of Hormuz) में तनाव के कारण तेल की सप्लाई बाधित हुई है।
– लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इतनी ज्यादा ऊंची हैं कि कम मात्रा में मंगाने के बावजूद हमारा कुल तेल आयात बिल 18.6 अरब डॉलर (करीब 1.77 लाख करोड़ रुपए) पर जा पहुंचा।

कच्चे तेल पर निर्भरता का कड़वा सच
– भारत अपनी कुल पेट्रोलियम जरूरतों का 85% से 90% हिस्सा विदेशों से आयात करके पूरा करता है।
– इस समय ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) $119 प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई (WTI) $120 प्रति बैरल के आसपास ट्रेड कर रहा है।
– जब तेल की कीमतें इतनी ऊंची होंगी, तो हमारा व्यापार घाटा बढ़ेगा, देश से डॉलर बाहर भागेंगे और रुपया लगातार गिरता चला जाएगा।

बढ़ते आयात बिल की वजह सिर्फ तेल, सोना या चांदी ही नहीं है
– अगर हम अप्रैल 2026 के आंकड़ों से पेट्रोलियम और जेम्स-ज्वेलरी को हटा भी दें, तो भी हमारा अन्य सामानों का आयात बढ़कर 45 अरब डॉलर (4.27 लाख करोड़ रुपए) हो गया है, जो पिछले साल अप्रैल 2025 में केवल 39 अरब डॉलर था।
– इसमें मुख्य रूप से लोहा, स्टील, chemical मटेरियल्स और वेजिटेबल ऑयल्स शामिल हैं, जिन्होंने भारत के आयात बिल को बहुत भारी बना दिया है।

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विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) क्यों छोड़ रहे हैं भारतीय बाजार?
– अब आपके मन में यह सवाल आ सकता है कि अगर यह व्यापार घाटा हमेशा से था, तो पहले रुपया इतनी तेजी से क्यों नहीं गिर रहा था?
– इसका जवाब है—कैपिटल गेन और विदेशी निवेश।
– साल 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों (Economic Reforms) के बाद, दुनिया भर के बड़े निवेशकों को भारत एक बहुत बड़ा और आकर्षक बाजार दिखाई देने लगा।
– बढ़ती खपत के कारण जो नुकसान हमें व्यापार घाटे से होता था, उसकी भरपाई विदेशों से आने वाले इसी निवेश से हो जाती थी।

– लेकिन आज इस निवेश मोर्चे पर क्या हालात हैं, इसकी तस्वीर देखना बहुत जरूरी है।
– देश में ऐसा माहौल बनाने की पूरी कोशिश की जा रही है कि विदेशी निवेशक हमारे यहाँ पैसा लगाएं, लेकिन हकीकत में एकदम उल्टा हो रहा है।
– विदेशी संस्थागत निवेशक यानी FII (Foreign Institutional Investors) भारत में नया पैसा लगाने के बजाय, जो पैसा उन्होंने पहले से भारतीय शेयर बाजार में लगा रखा था, उसे भी तेजी से बाहर निकाल रहे हैं।
– और यह सिलसिला आज का नहीं है, बल्कि कई महीनों से लगातार चल रहा है।


विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड बिकवाली के आंकड़े

– अगर हम पिछले साल यानी 2025 की बात करें, तो विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से लगभग 1.6 lakh करोड़ रुपए निकाले थे।
– तब आर्थिक विश्लेषकों ने इसे किसी एक साल की सबसे बड़ी बिकवाली बताया था।
– इसके बाद साल बदला, 2026 आया और नई उम्मीदें जगीं।
– शुरुआत में लगा कि स्थिति सुधरेगी, लेकिन 28 फरवरी 2026 के बाद अचानक सब कुछ बदल गया।

– 28 फरवरी के बाद अमेरिका और ईरान के बीच सीधे युद्ध जैसी स्थिति पैदा हो गई।
– इस वैश्विक तनाव का सबसे बुरा और सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा।
– दुनिया भर के निवेशक घबरा गए और वे उभरते हुए बाजारों (Emerging Markets) से अपना पैसा निकालकर किसी सुरक्षित और स्थिर ठिकाने यानी ‘Safe Haven’ की तरफ भागने लगे।
– घबराए हुए FIIs ने भारतीय शेयर बाजार में अपनी बिकवाली को और ज्यादा तेज कर दिया।

चौंकाने वाला आंकड़ा:
– साल 2026 को बीते हुए अभी केवल साढ़े 4 महीने ही हुए हैं, और विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से अब तक 1.92 लाख करोड़ रुपए निकाल चुके हैं।
– यानी पूरे 2025 में जितना पैसा निकला था, उससे कहीं ज्यादा पैसा 2026 के शुरुआती चार महीनों में ही भारत से बाहर जा चुका है।
– यह इतिहास की सबसे बड़ी बिकवाली है।

– आपको यह भी जानना चाहिए कि विदेशी निवेशकों की इस भगदड़ का असर सिर्फ भारत पर ही नहीं पड़ा है।
– बल्कि एशिया के कई अन्य देश, जो अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था के लिए जाने जाते हैं, वे भी इसकी चपेट में हैं।
– उदाहरण के लिए, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और टेक सेक्टर के लिए मशहूर दक्षिण कोरिया और ताइवान भी इस संकट से जूझ रहे हैं।
– सबसे भारी मार दक्षिण कोरिया पर पड़ी है, जहाँ से निवेशकों ने 35.3 अरब डॉलर निकाल लिए हैं।
– इस सूची में भारत दूसरे नंबर पर और ताइवान तीसरे नंबर पर है।

इस बिकवाली की असली वजह क्या है?
– आर्थिक समाचार पत्र ‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस बिकवाली की शुरुआत वास्तव में सितंबर 2024 से ही हो गई थी।
– उस समय भारतीय कंपनियों के तिमाही मुनाफे उनके शेयरों की आसमान छूती कीमतों (Valuations) से मैच नहीं कर रहे थे।
– यानी कंपनियों के शेयर महंगे थे लेकिन उनका मुनाफा उस अनुपात में कमजोर था।
– इसने निवेशकों के मन में डर पैदा किया और तब से शुरू हुआ यह सिलसिला आज वैश्विक युद्ध के कारण और भयानक रूप ले चुका है।

– पश्चिम एशिया में चल रही लड़ाई ने अनिश्चितता का माहौल बना दिया है।
– कब क्या हो जाए, कोई नहीं जानता।
– अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर कल सुबह क्या लिख दें, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता।
– ऐसी स्थिति में वैश्विक निवेशक जोखिम लेने के बजाय अपने पैसे को अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड्स में रखना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं।

– लेकिन अगर हम थोड़ा पीछे जाकर देखें, तो पिछले 4 साल में डॉलर की कीमत ₹20 से ज्यादा बढ़ चुकी है।
– और अकेले पिछले डेढ़ साल में डॉलर ₹10 महंगा हुआ है।
– इसका मतलब यह हुआ कि हम रुपए के गिरने की पूरी जिम्मेदारी सिर्फ आज के ईरान-अमेरिका युद्ध पर नहीं डाल सकते।
– रुपया इस युद्ध के शुरू होने से बहुत पहले से लगातार गिर रहा था।

– यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि मिडिल ईस्ट क्राइसिस तो सिर्फ एक ‘निमित्त’ यानी तात्कालिक कारण बना है, वह असली और एकमात्र कारण नहीं है।
– इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं—मान लीजिए हमारे घर की एक दीवार है जिसे दीमक ने अंदर ही अंदर सालों से खोखला कर रखा था।
– अब अचानक एक दिन भूकंप का एक हल्का झटका आता है और उस दीवार में बड़ी दरार आ जाती है।
– तो क्या आप उस दरार के लिए सिर्फ भूकंप को जिम्मेदार मानेंगे? नहीं।
– असली कमजोरी तो दीमक की वजह से थी।
– ठीक इसी तरह भूकंप का झटका तो यह युद्ध है, लेकिन हमारे रुपए की असली दीमक हमारा भारी व्यापार घाटा है।

– हमं विदेशों से सामान ज्यादा खरीदते हैं और अपनी सेवाएं और उत्पाद बाहर कम बेच पाते हैं।
– एक मोटे अनुमान के अनुसार, अगर हम विदेशों से सामान खरीदने पर $100 खर्च करते हैं, तो हमारी कुल डॉलर की कमाई सिर्फ $88 होती है।
– यानी सीधा-सीधा $12 का गैप हमारे करंट अकाउंट में हमेशा बना रहता है।
– इसी को करंट अकाउंट डेफिसिट (Current Account Deficit – CAD) कहते हैं।
– जब तक विदेशी कंपनियां (FDI) और विदेशी निवेशक (FII) हमारे बाजारों में पैसा ला रहे थे, तब तक इस घाटे की भरपाई हो रही थी।
– लेकिन अब जब डॉलर देश से वापस जा रहे हैं, तो डॉलर की किल्लत हो रही है और वह लगातार महंगा होता जा रहा है।

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आरबीआई (RBI) के हस्तक्षेप और उनके सामने खड़ी बड़ी चुनौतियां
– ₹100 की ओर तेजी से भागते हुए डॉलर को रोकने के लिए देश के केंद्रीय बैंक यानी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने कई बड़े और कड़े कदम उठाए हैं।
– इस वैश्विक संघर्ष के शुरू होने से पहले भारत के पास लगभग 728 अरब डॉलर का एक विशाल विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) मौजूद था।
– लेकिन बाजार में रुपए को सहारा देने के चक्कर में यह भंडार अब घटकर लगभग 690 अरब डॉलर के करीब रह गया है।
– इसका मतलब है कि हमारे फॉरेक्स रिजर्व में करीब 38 अरब डॉलर (यानी लगभग 3.61 लाख करोड़ रुपए) की भारी गिरावट आ चुकी है।

– यहाँ सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इस कुल गिरावट में से लगभग 28 अरब डॉलर तो आरबीआई ने सिर्फ अकेले मार्च के महीने में ही बाजार में झोंक दिए थे।
– इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि रिजर्व बैंक ने भारतीय मुद्रा को डूबने से बचाने के लिए कितने बड़े पैमाने पर करेंसी मार्केट में हस्तक्षेप (Intervention) किया है।

आरबीआई की आधिकारिक नीति
– इतने भारी डॉलर खर्च करने के बावजूद आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि वह रुपए को किसी एक विशेष या तय स्तर (जैसे ₹95 या ₹96) पर रोकने या बचाने की कोशिश नहीं कर रहा है।
– उसका एकमात्र उद्देश्य बाजार में होने वाले अत्यधिक उतार-चढ़ाव (Excessive Volatility) को नियंत्रित करना है, ताकि भारतीय बाजार में अफरातफरी न मचे।

– राहत की बात बस इतनी है कि वर्तमान में मौजूद 690 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भी भारत के लिए अगले 11 महीनों के आयात को कवर करने के लिए पर्याप्त है।
– लेकिन अर्थशास्त्रियों के मन में सवाल यह उठ रहा है कि जिस तेज रफ्तार से यह भंडार घट रहा है, आखिर आरबीआई कब तक इसी तरह लगातार बाजार में हस्तक्षेप कर पाएगा? उसकी भी एक सीमा है।

– देश के कुछ बड़े और जाने-माने अर्थशास्त्री तो अब यह भी दावा करने लगे हैं कि आने वाले समय में डॉलर की कीमत ₹110 या उससे भी ऊपर जा सकती है।
– तो क्या वाकई अब स्थिति सरकार और रिजर्व बैंक के हाथों से बाहर निकल चुकी है? क्या रुपए का संभलना अब नामुमकिन है?

– देखिए, यह बात सच है कि रुपया इस समय अपने सबसे कड़े मनोवैज्ञानिक स्तर (Psychological Barrier) को तोड़ चुका है और ₹100 तक जाने का डर वास्तविक है।
– लेकिन कई बड़े अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज हाउसेस और एक्सपर्ट्स का एक दूसरा पहलू भी है।
– उनका मानना है कि यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी शांत होती हैं, या भारत सरकार अमेरिका के साथ कोई बड़ी ट्रेड डील करने में सफल हो जाती है, जिससे देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) दोबारा बढ़ने लगे, तो यही डॉलर वापस घटकर ₹90 या ₹86 के स्तर पर भी आ सकता है। लेकिन इसके लिए संरचनात्मक सुधारों की जरूरत होगी।

– हमें यह समझना होगा कि आरबीआई डॉलर को कभी भी पूरी तरह से खुला नहीं छोड़ सकता।
– अगर करेंसी को पूरी तरह बाजार के भरोसे छोड़ दिया गया और डॉलर सचमुच ₹110 या ₹120 हो गया, तो देश में हाहाकार मच जाएगा।
– इसकी सीधी वजह यह है कि डॉलर महंगा होते ही हमारे देश में आयातित महंगाई (Imported Inflation) आ जाएगी।
– पेट्रोल और डीजल के दाम रातों-रात बढ़ जाएंगे, जिससे माल ढुलाई महंगी होगी और बाजार में हर छोटी-बड़ी चीज, सब्जी से लेकर सुई तक, सब महंगी हो जाएगी।
– इसी महंगाई के चक्रव्यूह से देश को बचाने के लिए आरबीआई अपने डॉलर बेचकर बाजार में डॉलर की सप्लाई बढ़ाता है, ताकि उसकी कीमत पर लगाम कसी जा सके।

क्या सरकार ने कदम उठाने में देर कर दी?
– बाजार में एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो यह आलोचना कर रहा है कि सरकार ने समय रहते सही नीतिगत कदम नहीं उठाए।
– लेकिन अब जब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा है और रुपए को संभालना मुश्किल हो रहा है, तो सारा बोझ आम जनता पर डाला जा रहा है।
– आज जनता से कहा जा रहा है कि आप सोना मत खरीदिए, विदेशों में छुट्टियां मनाने कम जाइए, तेल और गाड़ियों का इस्तेमाल कम से कम कीजिए ताकि देश का डॉलर बचाया जा सके।
– सवाल यह उठता है कि क्या इन अपीलों से वाकई कोई बड़ा जमीनी बदलाव आएगा? क्या इससे रुपए की सेहत सुधरेगी?

– हमें इस समस्या के दो पहलुओं को समझना होगा।
– पहली बात तो यह है कि हमारा जो व्यापार घाटा है, वह कोई ऐसी समस्या नहीं है जो किसी एक जादू की छड़ी से या किसी एक सरकार के प्रयास से रातों-रात खत्म हो जाए।
– यह एक संरचनात्मक समस्या (Structural Problem) है।
– यह तब तक बनी रहेगी जब तक भारत अपने देश में कुछ ऐसा निर्माण न करने लगे, कोई ऐसी तकनीक या उत्पाद न बना ले जिसे खरीदने के लिए पूरी दुनिया हमारे सामने लाइन लगाकर खड़ी हो जाए।
– जब तक हमारा एक्सपोर्ट नहीं बढ़ेगा, यह संकट हर वैश्विक युद्ध के समय लौट-लौट कर आता रहेगा।

– हमारे कुल इंपोर्ट बिल का एक बहुत बड़ा हिस्सा यानी एक-तिहाई (1/3) भाग सिर्फ दो चीजों—कच्चे तेल और सोने के आयात पर खर्च होता है।
– अगर देश की जनता अपनी तरफ से सोने की खपत कम करती है और हम ईंधन की बचत करते हैं, तो निश्चित रूप से हम देश के अरबों डॉलर बचा सकते हैं।
– लेकिन इसका एक दूसरा और खतरनाक दुष्परिणाम भी हो सकता है। अगर लोग खर्च करना कम कर देंगे, गाड़ियों का इस्तेमाल कम करेंगे, तो देश में खपत (Consumption) घट जाएगी।
– और यदि खपत घटी, तो हमारी फैक्ट्रियों में उत्पादन कम होगा, जिससे देश की आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी (GDP) के नीचे गिरने का खतरा पैदा हो जाएगा।

निष्कर्ष और आगे की राह
– यह पूरी समस्या इसलिए और ज्यादा गंभीर हो गई है क्योंकि युद्ध के कारण कच्चे तेल के दाम अचानक बहुत बढ़ गए हैं।
– युद्ध से पहले जो तेल $70 से $80 प्रति बैरल के आसपास मिल रहा था, वह आज $100 के पार जा चुका है।
– वर्तमान में भले ही हमारे पास 9 से 10 महीने का विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित है और घबराने की कोई तात्कालिक आवश्यकता नहीं है, लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब यह युद्ध आने वाले एक साल तक इसी तरह खिंच गया।

– अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम साल भर तक $100 प्रति बैरल से ऊपर बने रहे, तब भारत के सामने एक बहुत बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है।
– यही वजह है कि सरकार और रिजर्व बैंक आज से ही फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं और देश की जनता से बचत का आह्वान कर रहे हैं।
– आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि रुपए की यह गिरावट कहाँ जाकर रुकती है, और क्या भारतीय बाजार इस वैश्विक चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए कोई नया चमत्कार दिखा पाता है या नहीं।


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